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श्रीमद् भागवत अन्नक्षेत्र

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

भंडारा हिंदू धर्म में पवित्र अनुष्ठान करने और सर्वशक्तिमान की पूजा करने के बाद, भगवान को धन्यवाद देने और लोगों की सेवा करने के शुभ संकल्प को लेकर एक उत्सव का अवसर है । यह किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी भी संकल्प या उद्देश्य की पूर्ति होने पर भगवान को धन्यवाद देने के निमित्त आयोजित किया जा सकता है |

श्रीमद् भागवत से जीव में भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य के भाव उत्पन्न होते हैं । इसके श्रवण मात्र से व्यक्ति के पाप पुण्य में बदल जाते हैं । विचारों में बदलाव होने पर व्यक्ति के आचरण में भी अपने आप बदलाव हो जाता है । प्रसाद तीन अक्षर से मिलकर बना है । पहला अक्षर ‘प्र’ का अर्थ ‘प्रभु’ है, दूसरा ‘सा’ का अर्थ है ‘साक्षात्’ व तीसरा ‘द’ का अर्थ होता है ‘दर्शन’, जिसे हम सब प्रसाद कहते हैं । हर कथा या अनुष्ठान का सार तत्त्व होता है जो मन, बुद्धि व चित्त को निर्मल कर देता है । मनुष्य शरीर भी भगवान का दिया हुआ सर्वश्रेष्ठ प्रसाद है । भगवान को लगाए गए भोग का बचा हुआ शेष भाग मनुष्यों के लिए प्रसाद बन जाता है । अतः यही प्रसाद भागवत कथा के अंतिम दिवस पर सभी भक्तों में प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है |

धर्म पथिक पूज्य गुरुवर श्री शैलेन्द्र कृष्णजी द्वारा विश्व शांति एवं कल्याण के संकल्प को लेकर जहाँ-जहाँ भी श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जाता है, वहाँ-वहाँ कथा की पूर्णाहुति के दिवस पर सभी कथा प्रेमियों को भगवान का प्रसाद मिले, इस उद्देश्य से भंडारे का आयोजन किया जाता है ।